Tuesday, 26 January 2016

देश के पुकार

देश का कह रहल बा हमनी से,देखी!

अंजोरा में चाहे, अन्हरिया में,
चलत रहिह तू,हरदम रहिया में,
ना रुकब हम,ना रुकिह तू,
हँसत रहिह तू,हरवक्त जिनिगिया में,
चमकत रहिह तू, हरदम अन्हरिया में।
जय हिन्द,जय भारत।
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

तिरंगा

‪#‎तिरंगा‬
वीरता के प्रमाण ह,
देशवाँ के शान ह,
भारतीय के पहचान ह,
तिरंगा एकर नाम ह।

विस्तृत जानकारी हिंदी में:
प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है। यह एक स्वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था।
यह 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

Tuesday, 12 January 2016

पानी:-किल्लत और अनुभव

क्या कभी आपने सोचा भी है की पानी ना हो तो क्या हो सकता है? जी हाँ,समस्या कितनी गंभीर है या हो सकती है,शायद आप सोच भी नही पाएंगे। आज कुछ ऐसे ही अनुभव के दौर से गुजर रहा हूँ, तो लीजिये आज,इस समस्या से आप सबका परिचय कराता हूँ।
    हेलो,"कहाँ बारे,पानी नईखे आवत,पानी लेले अईहे त बोतल में" फोन उठाते ही दाग दिया मेरे मित्र सचिन ने। उस समय मैं अपनी नियमित कक्षाओ को अटेंड करने के बाद वापस लौट रहा था। किसी तरह एक प्याऊ से एक बोतल पानी लेकर मैं जैसे ही अपने रूम वापस पहुँचा तो पता चला की आने वाले 18 घंटे के लिए पानी की सप्लाई नही मिलने वाली है। जेहन में एक ही सवाल कौंधा,एक बोतल पानी,आने वाले 18 घंटे और तीन लोग? ई तो भद्दा मजाक हो गया रे! वाकई समस्या कुछ अधिक ही गंभीर और चिंताजनक थी,तो क्या किया जाए? हमेशा की तरह क्रांतिकारी विचार सुझाने वाला अखिलेश बोल उठा " 18 घंटा के ही त बात बा, एक दिन नाहिये खाईल जाइ त का हो जाई?"। उनमे क्रांतिकारी विचार तो मूसर से कूट कूट के भरे पड़े है भाई। खैर उस वक़्त तो हमने इसे दरकिनार करते हुए जैसे-तैसे भोजन करना ही उचित समझा।
          समस्या केवल पीने के पानी की ही नही थी भाई, बाकी तो आप खुदे समझदार है। बुझ लीजिये, जइसे-तइसे समय कट रहा था। शाम होने को आई, रात के लिए पानी का इंतेजाम कइसे हो? फिर क्या था,तीन आदमी,पाँच बोतल और कोटा की सड़क। इनका मिश्रण कुछ-कुछ लालु,नितीश जी के महागठबंधन के जईसा ही था। और पानी मिलने की चाहत ठीक जीतन राम मांझी के दोबारा सीएम पद पाने जैसी थी। ऐसे में उस वक्त जरूरत सिर्फ और सिर्फ रामविलास पासवान जी की तरह मौक़ा भुनाने वाले किसी आदमी की थी। आखिकार,विचार आ ही गया की महाकाल जी के पास चलते है। महाकाल, मेरे मेस का नाम है,और वो टिफिन पहुँचा चुके थे। खैर,अंतोगत्वा उन्होंने फ़रिश्ते की तरह हमे पानी उपलब्ध कराया और हम वापस अपने रूम पर थे।
इधर पानी के यथासम्भव बचाव के लिए हम आपस में ठीक उसी तरह उलझे पड़े थे जइसे दांव पे लगी परधानी की सीट हो। उधर जादव जी का क्रांतिकारी विचार पुनः आ चूका था "कुल्ला क के पानी फेके के जगे घोट जाईल जाई"। इस बिल को पास होने में हमारे छोटे से पार्लियामेंट में चंद सेकण्ड भी ना लगे। कानून लागू हो गया,हमने खाना खत्म किया और अपने-अपने कमरे में हो लिए।

पानी की ये छनिक समस्या तो जरूर खत्म हो गई,लेकिन पानी की किल्लत हमारे जेहन में घर कर चुकी है। अगर आपने भी कभी इस तरह की समस्या झेली हो तो हमसे शेयर करे। अधिक से अधिक लोगो को जागरूक करे। आपका एक छोटा प्रयास कइयों की प्यास बुझाने में बड़ा योगदान दे सकता है।



Monday, 11 January 2016

विरोधीयन के उहे हरा पावेला...

छोट छोट मौक़ा के भी ख़ुशी में तब्दील जे कर पावेला।
सबका चेहरा प भरपूर मुस्कान उहे लेआ पावेला।।

साँच के रहिया प निरंतर जे चलत रह पावेला।
हक आ सम्मान ला अंत तक उहे लड़ पावेला।।

दुःख आउर दर्द से आखिर तक जे जूझ पावेला।
राह में आवेवाला बाधा के उहे पार कर पावेला।।

प्यार आउर अपनत्व के महत्व जे जान पावेला।
हर रिश्ता के मान मर्यादा उहे राख पावेला।।

चेहरा प फईलल उदासी के जे पढ़ पावेला।
सभकर दुःख दर्द के उहे दूर कर पावेला।।

दोस्त आउर दुश्मन में फर्क जे समझ पावेला।
आपन हर कदम के उहे साध के चल पावेला।।

ताना आ आलोचना के आपन ताकत जे बना पावेला।
आज ना त काल्ह विरोधीयन के उहे हरा पावेला।।

Sunday, 10 January 2016

निगाहें ढूंढती है गाँव के उन बाजारों को...

निगाहें ढूंढती है गाँव के उन बाजारों को...

गाँवो में बाजार लगाने की सालो पुरानी प्रथा अब विलुप्ति के कगार पर है। एक समय था जब प्रत्येक गाँव में निर्धारित दिन/तिथि को बाजार लगता था। कुछ समय पहले तक शहरों की तरह गावों में स्थाई दुकाने नही हुआ करती थी। कई घरो के चूल्हे इन बाजारों से होनी वाली आमदनी से जला करते थे। तब कम पूंजी वाले दुकानदार भी आसानी से अपनी चलती-फिरती दुकान लगाया करते थे। उन्हें इन दुकानो को लगानें के एवज में जमीन मालिक को या तो मामूली रकम अदा करनी होती थी या फिर उसके बदले में समान दे दिया करते थे। कई दफा तो दरियादिली में लोग उन्हें मुफ़्त में ही दुकान लगाने दिया करते थे।
अब बाजार के उन छोटे दुकानों की जगह स्थाई दुकाने लगती है। हजारों की रकम उसके एवज में जमा की जाती है। नतीजतन स्वतः ही समानो के दाम बढ़ जाते है। हाँ ये सच है कि अब जब जरूरत होती है,हमे पसंद या जरूरत की वस्तुएं उसी वक्त मिल जाती है। परन्तु इस बाजारवाद के नए स्वरूप ने सैकड़ो छोटे दुकानदारो को उनके पारम्परिक पेशे से जुदा भी तो किया है।
तब लोग मिल-बाटकर अपनी जरूरते पूरी कर लेते थे। लोग समूहों में बाजार जाते थे,अत: गाँव-जवार के लोगों के मिलन का एक केंद्र होते थे ये बाजार। अब जिसे जिस की जरूरत है वह उसी वक्त खरीद लाता है। पहले लोग एक दूसर से मांगकर अपनी जरूरते पूरी किया करते थे जिससे आपसी प्रेम और सोहार्द बना रहता था। अब वो भाईचारा भी खात्मे की ओर है....
अपने विचार दे।

अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

लाल बहादुर शास्त्री(पुण्यतिथि 11 जनवरी)

11 जनवरी,देश के दुसरका प्रधामन्त्री लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि ह। उहाँ के एगो कविता के माध्यम से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि...

लालन में उ लाल बहादुर,
भारत माता के रहनी प्यारा।
कष्ट अनेक सह के उहाँ के,
निजी जीवन के रूप संवरनी।
तपाके खुद के श्रम के ज्वाला में,
उहां के सधनी आपन जीवन।
बना लिहनी साँच अर्थन में,
निर्मल आउर कांतिमय कुंदन।
साँच आउर त्याग के मूर्ति रही,
चाहत ना रही कउनो आडम्बर।
निर्धनता उहाँ के देखले रही ,
दिखाई दया उहाँ के निर्धन प।
युद्ध से ना घबराई उहाँ के,
विश्व-शांति के रही दीवाना।
एही शांति के बलवेदी प,
ज्ञात रहे उहाँ के मर-मिट जाना।
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

उस पत्थर ने कुछ तो कहा होगा???

शायद उस पत्थर ने आखिर तक प्रतिकार किया हो? मानवता और भाईचारे की सैकड़ो दुहाईयाँ दी हो? कहा हो,अरे जनाब किसे मारना चाहते है? आखिर उछालना किसपे चाहते हो? उस डॉक्टर को जिसने तुम्हे मौत के मुँह से निकाला था या फिर उस मास्टर को जिसने तुम्हारे बाल-बच्चों को पढ़ाकर काबिल बनाया।
उसने इतिहास का पाठ भी समझाया हो? कहा होगा,गवाह हूँ मै इन उन्मादी घटनाओं का। इससे आम-जनता को कुछ हासिल नही होता है। हाँ,ये अलग बात है की कुछ चंद मजहब और धर्म के सिपालसहारों का मकसद स्वतः पूरा हो जाता है। बताया होगा की धार्मिक जज्बात को मोहरा बनाकर वे कुर्सी और लालबत्ती को अपना बना लेते है,और खड़ा रह जाता है आमजन वही का वही ,जहाँ वो पहले खड़ा था। ये झनिक प्रवाह तक़दीर को नही बदल पाते।

उसने कहा होगा,जनाब कम से कम आप तो ये ना कीजिए। आपने तो पूर्व में भी कई दफा देखे है ऐसे उन्माद। आपको तो पता ही है,इनसे कुछ नही होता है। हाँ,पीढियां जरूर कई साल पीछे चली जाती है। कई दफा विनती भी की होगी, की जनाब नवयुवकों को पीछे मुड़ने का आदेश दीजिये। अपने ही भाइयों, अपने ही साथियों को सिर्फ धर्म के नाम पर हो रहे हमले से बचाईये।फिर भी आखिरकार आपने उस पत्थर के अथक प्रयास को दरकिनार कर उसे उछालने का अंतिम फैसला लिया होगा।

तब आपको इस बात का आभास भी न रहा होगा की वो पत्थर आपने किसी अन्य धर्म के लोगो के ऊपर ना उछालकर खुद के पाँव पर चलाया है। न्यूटन महोदय के त्तृतीये नियम " Every action has its equal & opposite reaction" का आपको भान  भी न रहा होगा। यकीन मानिये छनिक आवेश में आकर आपने चंद मजहबी ताकतों का भला किया है और कुछ नही। मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नही की आपने पत्थर उछाला क्योंकि जो पत्थर(कुल्हाड़ी) आपने उछाला है ना,वो आपके ही आने वाली पीढ़ियों के सीने पर वार करने वाली है...
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

अहमियत है ही क्या??

मिटा ना सका जो बढ़ती दूरियाँ,
उस रिश्ते की परवाह ही क्या?
जोड़ ना सका जो टूटे दिलो को,
भावनाओ का वो सैलाब ही क्या?

निभा ना सका जो कसमे-वादे,
उस रिश्ते की परवाह ही क्या?
बना ना सका जो अपना मुझे,
मेरे लिए उसकी अहमियत है ही क्या??
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

Thursday, 7 January 2016

अधूरे ख्वाब

आधे-अधूरे ख्वाबों की कहानी ही क्या?
जो पूर्ण ना हो सके उसकी रवानी ही क्या?
जिसे पाने की तमन्ना ना हो वो चाहत ही क्या? जो ना हो आदत अगर जीत जाने की,
तो उस परवाने की कहानी ही क्या?
अनुराग रंजन
छपरा(मशरख)

Wednesday, 6 January 2016

जगहिया उ खुदे बनावेला

वक़्त के मांग के आपन ढ़ाल जे बना पावेला।
बिगड़ल भगिया के उ खुद ही चमकावेला।।

पपनिया के वक़्त के साथ जे झपकावेला।
राह के कांटन के उ खुद ही हटा पावेला।।

निर्मल जे आपन सोच के राख पावेला।
संस्कृति आ संस्कार के उहे बचा पावेला।।

जाति,धर्म आ व्यक्तिगत रंजिश से ऊपर जे उठ पावेला।
समाज में फईलल कुरीतियन के उहे मिटा पावेला।।

परम्परा आ विश्वास के जे जोगा पावेला।
सबसे अलग पहचान उहे  बना पावेला।।

खुद-ब-खुद सबका के जे आपन बना पावेला।
सभकर दिलवा में जगहिया उ खुदे बनावेला।।